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PM मोदी को वाराणसी की बेटी हिरल ने लिखा पत्र, महिलाओं के सम्मान के लिए ‘स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ’ शब्द बदलने की मांग

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वाराणसी। उत्तर प्रदेश के वाराणसी से एक अनोखी पहल सामने आई है। चेतगंज निवासी हिरल श्रीवास्तव ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भावुक पत्र लिखकर महिलाओं के सम्मान से जुड़ी एक महत्वपूर्ण मांग उठाई है। हिरल ने ‘स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ’ शब्द को बदलकर ‘स्त्री एवं प्रसूति स्वास्थ्य विशेषज्ञ’ करने की अपील की है। हिरल का मानना है कि इस छोटे से बदलाव से महिलाओं के प्रति समाज की सोच को अधिक सकारात्मक और सम्मानजनक बनाया जा सकता है।

हिरल ने अपनी मां गरिमा श्रीवास्तव के माध्यम से प्रधानमंत्री कार्यालय, नई दिल्ली को पत्र भेजकर इस विषय पर विचार करने का अनुरोध किया है। पत्र में उन्होंने कहा है कि जिस तरह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘विकलांग’ शब्द के स्थान पर ‘दिव्यांग’ शब्द के उपयोग को बढ़ावा देकर दिव्यांगजनों के प्रति सम्मान की भावना को मजबूत किया, उसी तरह महिलाओं के स्वास्थ्य से जुड़े चिकित्सकीय पदनाम में भी बदलाव किया जाना चाहिए।

हिरल ने अपने पत्र में लिखा है कि ‘स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ’ शब्द में शामिल ‘रोग’ शब्द उन्हें उचित नहीं लगता। उनका मानना है कि महिलाओं के स्वास्थ्य, गर्भावस्था और प्रसव जैसी प्राकृतिक प्रक्रियाओं को केवल बीमारी के नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए। यदि इस पदनाम में ‘रोग’ की जगह ‘स्वास्थ्य’ शब्द का इस्तेमाल किया जाए तो यह महिलाओं के प्रति अधिक सम्मानजनक संदेश देगा।

हिरल की मां गरिमा श्रीवास्तव ने बताया कि यह विचार उनकी बेटी के मन में स्वयं आया था। उसने अपनी मां से प्रधानमंत्री को पत्र लिखने की इच्छा जताई। गरिमा के अनुसार, हिरल बेहद भावुक होकर कह रही थी कि ‘मोदी अंकल सबकी सुनते हैं। उन्होंने दिव्यांग शब्द देकर लोगों को सम्मान दिया है। अब महिलाओं के सम्मान के लिए भी कुछ करना चाहिए।’

प्रधानमंत्री को लिखे पत्र में हिरल ने उन्हें अपना ‘सुपर हीरो अंकल’ बताया है। उसने उम्मीद जताई है कि प्रधानमंत्री उसकी इस छोटी-सी मांग पर ध्यान देंगे और महिलाओं के सम्मान की दिशा में सकारात्मक पहल करेंगे।

हिरल का कहना है कि भाषा और शब्दों का समाज की सोच पर गहरा प्रभाव पड़ता है। शब्दों में किया गया छोटा बदलाव भी लोगों के दृष्टिकोण को बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। गर्भावस्था और प्रसव को बीमारी के बजाय महिलाओं के स्वास्थ्य और मातृत्व से जुड़ी स्वाभाविक प्रक्रिया के रूप में देखा जाना चाहिए।

वाराणसी की हिरल श्रीवास्तव की यह पहल महिलाओं के सम्मान और स्वास्थ्य से जुड़ी भाषा को अधिक संवेदनशील बनाने का संदेश देती है। अब देखना होगा कि प्रधानमंत्री कार्यालय की ओर से इस अपील पर क्या प्रतिक्रिया सामने आती है।

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