जगदलपुर, 23 अक्टूबर। विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा में शामिल होने के लिए जगदलपुर पहुंची राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने मुरिया दरबार की प्रशंसा करते हुए कहा कि मैं भी उसी संस्कृति से आई हूं. मेरे दादा और पिता मांझी हुआ करते थे. मैं मांझी की बेटी हूं. मुझे परम्परा के बारे में जानकारी है. पहले राजाओं ने शासन किया, फिर ब्रिटिश आए और अब लोकतांत्रिक व्यवस्था है. हर समय नियम-कानून बदलता है, लेकिन आदिवासियों का अपना कानून है. सब शांति से एक साथ रहते हैं. खुशिया और त्योहार एक साथ मनाते हैं.
मुरिया दरबार में शामिल राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने कहा कि सुख शांति और आनंद से रहना ही आदिवासी समाज का मकसद है. आदिवासी परंपरा काफी सुंदर है. आज गांव में मांझी और परगना होते हैं, और अपनी समस्या बैठक करके मांझी और मुखिया समाधान करते हैं. लेकिन आज थाना, कोर्ट-कचहरी जाते हैं, लेकिन यह समस्या लंबी चलती है. कोर्ट-कचहरी में नहीं जाएं, बल्कि मुरिया दरबार को सम्मान दें.
उन्होंने कहा कि कोर्ट में आर्थिक नुकसान होता है, और मुरिया दरबार को बनाये रखें और उसका पालन करें. मुरिया दरबार काफी पॉवरफुल है. गांव के भलाई के लिए एक साथ पूजा-पाठ करते हैं. कहा जाता है विश्वास ही भगवान है, सभी समस्या को गांव में ही समाधान करना चाहिए. ऐसे ही पंचायत में होता है. आज भी इस परंपरा को बनाये रखें. अपनी पहचान और धरोहर, सुख सम्पति और भाईचारा को बनाकर रखना है. इस मुरिया दरबार को निरन्तर बनाये रखें कभी बंद नहीं करें.
वहीं लालबाग मैदान में आयोजित कार्यक्रम में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने सभी को दहशरा पर्व की बधाई देते हुए कहा कि बस्तर दशहरा उत्सव में सभी समाज की सहभागिता साधारण नहीं है. विभिन्न वर्गों को आत्मीयता से भरने का कार्य विशेष है. मांझियों ने मुरिया दरबार के बारे में समझाया. यह व्यवस्था जमीन से जुड़ी है. मुरिया दरबार से खुशहाली का मार्ग है. इससे लोकतंत्र बढ़ता है. प्रतिनिधि मंडल से मुलाकात हुई थी. जिसमे बस्तर पंडुम का निमंत्रण मिला था.
उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ नक्सलवाद से जुड़ा था. केंद्र और राज्य सरकार ने काम किया. नक्सल आतंक से पीड़ित लोग मुक्त हुए हैं, और आगे बढ़ रहे हैं. देश के सुदूर अंचलो में रहने वाले लोगों को ऊर्जा मिला. बस्तर एरिया में बस्तर ओलम्पिक हुआ. जिसमें आदिवासी लोगों ने भाग लिया. यहां के खिलाड़ी आगे चलकर ओलम्पिक में मैडल ला सकते हैं.
राष्ट्रपति ने कहा कि इस क्षेत्र की दंडकारण्य कहा जाता है. वाल्मीकि रामायण में दंडकारण्य का जिक्र है. यह भगवान राम का स्थान है. जहां वनवासी बनकर रहते थे, यहां की जनजाति उनसे मिले होंगे. भगवान का धूल यहाँ पड़ा है. इसकी पवित्रता को बनाये रखना सबका कर्तव्य है. आज भी जनजातीय समाज में राम, लक्ष्मण और सीता के नाम का जिक्र है. सीता का अपरहण और रावण का संहार और देवी शबरी से मिलना भी दंडकारण्य में हुआ था.
उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ में विकास के कई द्वार खुल रहा है. आतंकवाद का पीड़ा खत्म हुआ. पिछले कुछ समय मे वित्तीय सुविधा और बाजार से जुड़ने का पहल तेज है. 1947 तक विकसित करने के लिए उपयोगी है. यह समाज आगे विकसित करने के लिए पर्याप्त है. यहां पेड़-पौधों की पूजा होती है. पत्थरों की पूजा होती है. मिट्टी की पूजा होती है. पेड़-पौधे जीवनदाता हैं. जल, वायु और जीवन के लिए उपयुक्त सभी चीजें पेड़ों से मिलता है. खाना भी पेड़ों से मिलता है. बारिश आंधी तूफान सभी इसी से होते हैं. यह जंगल का पेड़ पौधा कुदरत का देन है. जंगल और पहाड़ को बनाये रखना सबका कर्तव्य है.






