कोरबा, 26 अक्टूबर। दीपावली पर्व नजदीक आने के साथ ही कोरबा के बाजारों में त्योहार की तैयारियां तेज होने लगी हैं। घरों, मंदिरों और प्रतिष्ठानों को रोशन करने के लिए मिट्टी के दीयों की बढ़ती मांग को देखते हुए प्रजापति समुदाय के कुम्हार इन्हें तैयार करने में जुट गए हैं। शहर के सीतामढ़ी, मोतीसागरपारा सहित विभिन्न क्षेत्रों में पारंपरिक तरीके से मिट्टी के दीये और दीप सज्जा की सामग्री बनाने का काम जोर-शोर से चल रहा है। कुम्हारों ने समय पर पर्याप्त संख्या में दीये तैयार कर बाजार तक पहुंचाने के लिए अपने काम की रफ्तार बढ़ा दी है।
दीपावली पर मिट्टी के दीये जलाने की परंपरा का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व है। रोशनी के इस पर्व पर घरों के आंगन, दरवाजों, मंदिरों और प्रतिष्ठानों में दीप प्रज्वलित किए जाते हैं। यही वजह है कि दीपावली से पहले मिट्टी के दीयों की मांग बढ़ जाती है। इस मांग को पूरा करने के लिए कुम्हार कई दिनों पहले से ही तैयारियों में जुट जाते हैं।
दीये बनाने की प्रक्रिया में मिट्टी को तैयार करने से लेकर उसे आकार देने, सुखाने और भट्ठी में पकाने तक कई चरण शामिल होते हैं। कारीगर लगातार मेहनत कर रहे हैं, ताकि समय रहते दीयों की पर्याप्त खेप तैयार की जा सके। इस काम में परिवार के अन्य सदस्य भी सहयोग कर रहे हैं। दिनभर चाक चलाकर दीयों को आकार दिया जा रहा है, वहीं तैयार दीयों को सुखाने और पकाने का काम भी लगातार जारी है।
कुम्हारों के लिए दीपावली का सीजन आर्थिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना जाता है। त्योहार के दौरान होने वाली बिक्री से उन्हें अतिरिक्त आमदनी की उम्मीद रहती है। सालभर पारंपरिक मिट्टी के बर्तन और अन्य सामग्री बनाने वाले कारीगरों के लिए यह समय अपने हुनर और मेहनत का बेहतर प्रतिफल पाने का अवसर होता है।
मिट्टी के दीयों का उपयोग स्थानीय कारीगरों की पारंपरिक कला को जीवित रखने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। आधुनिक सजावटी रोशनी के विकल्पों के बीच पारंपरिक दीयों की अपनी अलग पहचान बनी हुई है। दीपावली पर मिट्टी के दीये खरीदकर उनका उपयोग करना स्थानीय कुम्हारों के पारंपरिक व्यवसाय को प्रोत्साहन देने के साथ ही त्योहार की सांस्कृतिक परंपरा को आगे बढ़ाने में भी सहायक है।







