Home / Madhya Pradesh / भारत की दिशा बदलने वाले पांच प्रधानमंत्री और उनके ऐतिहासिक फैसले: डॉ. अतुल मलिकराम (राजनीतिक रणनीतिकार)

भारत की दिशा बदलने वाले पांच प्रधानमंत्री और उनके ऐतिहासिक फैसले: डॉ. अतुल मलिकराम (राजनीतिक रणनीतिकार)

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25 जून 1975 से 21 मार्च 1977 तक लगा आपातकाल भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का निर्णायक अध्याय था। इसके बाद देश की राजनीति में सत्ता परिवर्तन के साथ शासन की प्राथमिकताओं, सामाजिक न्याय, तकनीकी विकास और आर्थिक नीति को लेकर नए प्रयोग शुरू हुए। 1977 से अब तक के सफर में कुछ निर्णय ऐसे रहे, जिनका प्रभाव तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों से कहीं आगे तक पहुंचा। इन फैसलों का महत्व केवल इस बात में नहीं है कि उन्हें किस प्रधानमंत्री ने लिया, बल्कि इस बात में है कि उन्होंने भारतीय राज्य, समाज और अर्थव्यवस्था की दिशा को किस तरह प्रभावित किया।
मार्च 1977 में मोरारजी देसाई के नेतृत्व में जनता पार्टी की सरकार बनी। उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती लोकतांत्रिक संस्थाओं में जनता का विश्वास बहाल करना था। 1978 का 44वां संविधान संशोधन इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित हुआ। इसने आपातकाल घोषित करने की प्रक्रिया को अधिक कठोर बनाया, नागरिक स्वतंत्रताओं की सुरक्षा मजबूत की और जीवन तथा व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े अनुच्छेद 20 और 21 के अधिकारों को आपातकाल में भी निलंबित न किए जा सकने का संरक्षण दिया। प्रेस की स्वतंत्रता के पक्ष में देसाई का सार्वजनिक रुख भी इसी दौर की महत्वपूर्ण विरासत था। इस सरकार का योगदान इसलिए उल्लेखनीय है कि उसने सत्ता परिवर्तन को केवल राजनीतिक घटना न रहने देकर संवैधानिक जवाबदेही से जोड़ने का प्रयास किया।
इसके बाद 1980 के दशक में कंप्यूटर और दूरसंचार को लेकर भारत की नीतियों में बदलाव की शुरुआत हुई। राजीव गांधी के कार्यकाल में तकनीकी आधुनिकीकरण को सरकारी प्राथमिकता मिली। उनके द्वारा दूरसंचार अनुसंधान केंद्र सी-डॉट और एमटीएनएल की स्थापना एक महत्वपूर्ण कदम तो था ही साथ ही वर्ष 1986 की सॉफ्टवेयर नीति ने सॉफ्टवेयर विकास और निर्यात को प्रोत्साहित करने की दिशा में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। स्वदेशी दूरसंचार तकनीक, कंप्यूटर के बढ़ते इस्तेमाल और संचार नेटवर्क के विस्तार ने आगे चलकर भारत के सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र के विकास के लिए आधार तैयार किया। इस बदलाव का वास्तविक महत्व यह था कि तकनीक को सीमित औद्योगिक गतिविधि के बजाय राष्ट्रीय विकास के साधन के रूप में देखा जाने लगा।

वहीं 7 अगस्त 1990 को प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार ने मंडल आयोग की सिफारिशों के आधार पर केंद्र सरकार की नौकरियों में सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण लागू करने का निर्णय घोषित किया। आयोग ने 1980 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की थी। इस फैसले ने देशव्यापी बहस, विरोध और राजनीतिक पुनर्संरचना को जन्म दिया। 1992 में सर्वोच्च न्यायालय ने इंद्रा साहनी मामले में आरक्षण संबंधी व्यवस्था को बरकरार रखते हुए क्रीमी लेयर को बाहर रखने सहित महत्वपूर्ण शर्तें निर्धारित कीं। इस निर्णय ने सरकारी सेवाओं में प्रतिनिधित्व, अवसरों की समानता और सामाजिक न्याय को राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में ला दिया। इसके प्रभाव से पिछड़े वर्गों की राजनीतिक भागीदारी और प्रतिनिधित्व का प्रश्न आने वाले दशकों में और प्रमुख हुआ।
एक तरफ मंडल कमीशन की चर्चा अभी गर्म ही थी और दूसरी तरफ 1991 में भारत गंभीर भुगतान-संतुलन संकट से गुजर रहा था। विदेशी मुद्रा की कमी, बढ़ते बाहरी दबाव और आर्थिक अनिश्चितता ने सरकार के सामने तत्काल चुनौती खड़ी कर दी थी। प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव और तत्कालीन वित्त मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व में 24 जुलाई 1991 को नई औद्योगिक नीति प्रस्तुत की गई। इसके तहत अधिकांश उद्योगों में लाइसेंस व्यवस्था समाप्त करने, विदेशी निवेश के लिए रास्ते खोलने और सरकारी नियंत्रणों में कमी लाने की दिशा में कदम उठाए गए। इन सुधारों ने भारतीय अर्थव्यवस्था को अधिक प्रतिस्पर्धी बनाने की प्रक्रिया शुरू की। यह बदलाव किसी एक घोषणा तक सीमित नहीं था; इसने उद्योग, व्यापार, निवेश और वैश्विक अर्थव्यवस्था से भारत के संबंधों को नए सिरे से परिभाषित किया।
इसके बाद आया साल 2005, जहां भारत और अमेरिका के बीच घोषित नागरिक परमाणु सहयोग की पहल मनमोहन सिंह सरकार के सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक फैसलों में शामिल रही। 2008 में अंतरराष्ट्रीय परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह से भारत को विशेष छूट मिलने के बाद वैश्विक नागरिक परमाणु व्यापार में सहयोग का रास्ता खुला। भारत ने परमाणु अप्रसार संधि (एनपीटी) पर हस्ताक्षर किए बिना यह व्यवस्था हासिल की, जो उसकी विदेश नीति और रणनीतिक स्वायत्तता के लिहाज से महत्वपूर्ण थी। इस समझौते को लेकर देश में तीखी राजनीतिक बहस हुई और सरकार को संसदीय विश्वास मत का सामना भी करना पड़ा। इसके बावजूद सरकार ने समझौते को आगे बढ़ाया। मनमोहन सिंह के कार्यकाल में 93वें संविधान संशोधन और केंद्रीय शिक्षण संस्थानों में ओबीसी आरक्षण के क्रियान्वयन ने शिक्षा में प्रतिनिधित्व की बहस को भी नया आयाम दिया।

इन पांच निर्णयों की ऐतिहासिक महत्ता उनके राजनीतिक लाभ या नुकसान से नहीं, बल्कि उनके दीर्घकालिक प्रभाव से समझी जानी चाहिए। लोकतांत्रिक संस्थाओं की सुरक्षा, तकनीकी आधुनिकीकरण, सामाजिक प्रतिनिधित्व, आर्थिक उदारीकरण और रणनीतिक कूटनीति, इन सभी ने अलग-अलग समय पर भारत की दिशा निर्धारित की। किसी भी प्रधानमंत्री का मूल्यांकन केवल उसकी लोकप्रियता या सरकार की अवधि से नहीं किया जा सकता। इतिहास में उसकी वास्तविक जगह इस बात से तय होती है कि उसके निर्णयों ने संस्थाओं को कितना मजबूत किया, अवसरों का कितना विस्तार किया और आने वाली पीढ़ियों के लिए कैसी संभावनाएं निर्मित कीं।

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