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एक ही प्लेटफॉर्म पर कैसे बनती हैं अलग-अलग कारें? जानिए कंपनियों का ये कमाल का खेल, जिससे बचता है करोड़ों का खर्च

अगर आप अलग-अलग कार कंपनियों की गाड़ियां देखते हैं, तो कई बार लगता है कि हर कार को बिल्कुल नए सिरे से बनाया जाता होगा. लेकिन असल कहानी थोड़ी अलग है. कार कंपनियां एक ऐसा बेस तैयार करती हैं, जिस पर जरूरत के हिसाब से कई अलग-अलग मॉडल बनाए जा सकते हैं. इसी बेस को कार प्लेटफॉर्म कहा जाता है.अब सवाल है कि एक ही प्लेटफॉर्म पर अलग डिजाइन, अलग साइज और अलग कीमत वाली कारें आखिर बनती कैसे हैं और कंपनियां ऐसा करके करोड़ों रुपये कैसे बचाती हैं? चलिए आपको इसके बारे में विस्तार से बताते हैं.

पहले समझिए, कार प्लेटफॉर्म क्या होता है?
कार प्लेटफॉर्म को आप घर के मजबूत ढांचे की तरह समझ सकते हैं. घर का बेस और मुख्य ढांचा एक जैसा रह सकता है, लेकिन उसके ऊपर कमरे, डिजाइन और इंटीरियर अलग बनाए जा सकते हैं. कार प्लेटफॉर्म भी कुछ इसी तरह काम करता है.

इसमें कार के कई जरूरी हिस्सों की बेसिक जगह और स्ट्रक्चर पहले से तय होता है. जैसे पहियों की स्थिति, सस्पेंशन से जुड़ी जगह, इंजन या मोटर लगाने का तरीका और कार के नीचे का मुख्य ढांचा. इसके बाद कंपनी इसी बेस को जरूरत के हिसाब से छोटा-बड़ा या मॉडिफाई करके अलग-अलग कारें तैयार करती है.

एक प्लेटफॉर्म, कई कारें
इसे एक आसान उदाहरण से समझिए. मान लीजिए किसी कंपनी ने ऐसा प्लेटफॉर्म तैयार किया है, जिसे अलग-अलग लंबाई और चौड़ाई की कारों में इस्तेमाल किया जा सकता है. अब उसी बेस पर छोटी SUV, बड़ी SUV या दूसरी बॉडी स्टाइल वाली कार बनाई जा सकती है.

बाहर से इन कारों का डिजाइन एक-दूसरे से बिल्कुल अलग लग सकता है. लेकिन अंदर कई चीजों की नींव एक जैसी हो सकती है.यही वजह है कि एक ही कंपनी की अलग-अलग कारों में कुछ पार्ट्स, इलेक्ट्रॉनिक्स या तकनीक एक जैसी देखने को मिलती है.

दुनिया की कई बड़ी कार कंपनियां इसी रणनीति का इस्तेमाल करती हैं. उदाहरण के लिए, Volkswagen Group का MQB प्लेटफॉर्म अलग-अलग साइज और बॉडी वाली कई कारों के लिए इस्तेमाल किया गया है. यानी प्लेटफॉर्म एक तरह से कंपनी के लिए ऐसा बेस बन जाता है, जिस पर कई मॉडल तैयार किए जा सकते हैं.

कंपनियां ऐसा क्यों करती हैं?
इसका सबसे बड़ा कारण है समय और पैसा बचाना.अगर हर नई कार के लिए बिल्कुल नया प्लेटफॉर्म तैयार करना पड़े, तो इंजीनियरिंग, टेस्टिंग और प्रोडक्शन में बहुत ज्यादा समय और पैसा लगेगा. लेकिन एक मजबूत प्लेटफॉर्म तैयार होने के बाद उसी बेस को कई मॉडल में इस्तेमाल किया जा सकता है.इससे कंपनी को पार्ट्स की खरीद, फैक्ट्री में प्रोडक्शन और कार की टेस्टिंग जैसे कई कामों में भी फायदा मिल सकता है. यानी एक प्लेटफॉर्म बनाना महंगा जरूर हो सकता है, लेकिन उसका इस्तेमाल कई कारों में करने से कंपनी लंबे समय में अपनी लागत को बांट सकती है.

ग्राहक को इसका क्या फायदा?
इसका फायदा सिर्फ कार कंपनियों को नहीं मिलता. जब एक ही इंजीनियरिंग बेस पर कई मॉडल तैयार होते हैं, तो कंपनी का खर्च अलग-अलग कारों में बांटा जा सकता है. इसके अलावा किसी प्लेटफॉर्म पर डेवलप की गई कुछ तकनीक या सेफ्टी सिस्टम को दूसरे मॉडल में भी इस्तेमाल किया जा सकता है. इससे नई कार तैयार करने का काम ज्यादा आसान हो सकता है. हालांकि इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि एक ही प्लेटफॉर्म वाली सभी कारें एक जैसी होती हैं.

प्लेटफॉर्म एक, लेकिन कार का अनुभव अलग
यह सबसे जरूरी बात है. एक ही प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल होने के बावजूद कारों में काफी अंतर हो सकता है. कंपनी अलग बॉडी, लंबाई, इंजन, बैटरी, सस्पेंशन, फीचर्स और इंटीरियर का इस्तेमाल कर सकती है. यहां तक कि कार की ट्यूनिंग भी अलग रखी जा सकती है.इसलिए दो कारों का बेस कुछ हद तक एक जैसा होने के बावजूद सड़क पर उनका ड्राइविंग एक्सपीरियंस अलग हो सकता है.

अब प्लेटफॉर्म सिर्फ लोहे का ढांचा नहीं
आज के समय में कारों का मतलब सिर्फ इंजन और पहियों तक सीमित नहीं है. इलेक्ट्रॉनिक्स, सॉफ्टवेयर, कनेक्टेड फीचर्स और इलेक्ट्रिक पावरट्रेन भी कार का बड़ा हिस्सा बन चुके हैं.ऐसे में कंपनियां अब ऐसे प्लेटफॉर्म तैयार करने पर ध्यान दे रही हैं, जिनमें अलग-अलग पावरट्रेन और नई तकनीक को शामिल किया जा सके.यानी आने वाले समय में एक ही बेस पर पेट्रोल, हाइब्रिड और इलेक्ट्रिक जैसे अलग-अलग आप्शन देखने को मिल सकते हैं.

असली खेल यहीं है
सीधी भाषा में कहें तो कार प्लेटफॉर्म किसी एक कार का मॉडल नहीं है. यह वह बेसिक इंजीनियरिंग ढांचा है, जिसे कंपनी कई अलग-अलग कारों के लिए इस्तेमाल कर सकती है.एक सफल प्लेटफॉर्म कंपनी को सिर्फ पैसा बचाने में मदद नहीं करता, बल्कि नई कारों को तेजी से तैयार करने और अलग-अलग सेगमेंट में मॉडल उतारने का रास्ता भी खोलता है.

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