कोरबा,18 अक्टूबर 2026। छत्तीसगढ़ के आदिवासी बाहुल्य कोरबा जिले में आस्था की कहानी केवल मंदिरों तक सीमित नहीं है। यहां की पहाड़ियों, घने जंगलों और ग्रामीण अंचलों में देवी उपासना की ऐसी परंपराएं आज भी जीवित हैं, जो आधुनिक समय में भी अपनी अलग पहचान बनाए हुए हैं। इन धार्मिक स्थलों पर पूजा के तौर-तरीके, लोक मान्यताएं और नवरात्र के अनुष्ठान क्षेत्र की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत की झलक प्रस्तुत करते हैं। कहीं देवी को प्रसन्न करने के लिए सफेद ध्वज अर्पित किया जाता है, तो कहीं प्रतिमा के स्थान पर आसन की पूजा होती है। इन परंपराओं में आदिवासी संस्कृति, प्रकृति के प्रति श्रद्धा और पीढ़ियों से चली आ रही आस्था का अनूठा संगम दिखाई देता है।
कोरबा के कोसगाईगढ़ की पहाड़ी पर स्थित देवी मंदिर इस विरासत का महत्वपूर्ण उदाहरण है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, यहां लगभग 1200 वर्षों से पूजा-अर्चना की परंपरा चली आ रही है। देवी को श्वेत ध्वज अर्पित करना यहां की विशिष्ट धार्मिक परंपरा है। पहाड़ पर मौजूद प्राचीन किले के अवशेष इस स्थान के ऐतिहासिक महत्व की ओर भी संकेत करते हैं। मान्यता है कि इस क्षेत्र में कभी हैहयवंशी राजाओं का शासन रहा था। इस तरह कोसगाईगढ़ धार्मिक आस्था के साथ इतिहास को भी अपने भीतर समेटे हुए है।
पोड़ी उपरोड़ा क्षेत्र का मातिन दाई मंदिर अपनी अलग पूजा-पद्धति के कारण विशेष महत्व रखता है। यहां देवी की प्रतिमा के बजाय उनके आसन की पूजा की जाती है। यह परंपरा दर्शाती है कि लोक आस्था में देवी की उपस्थिति का भाव केवल मूर्ति तक सीमित नहीं है। क्षेत्र की प्राचीन पहचान और गोंड राजाओं के शासन से जुड़ी मान्यताएं भी इस धार्मिक स्थल की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि को विशिष्ट बनाती हैं।
मड़वारानी पहाड़ पर स्थित देवी मंदिर की परंपरा भी दूसरी जगहों से अलग है। यहां चैत्र नवरात्र की शुरुआत शुक्ल प्रतिपदा से होती है, जबकि शारदीय नवरात्र पंचमी तिथि से प्रारंभ होता है। नवरात्र के दौरान कलश स्थापना, जवारा बोने और ज्योति कलश प्रज्ज्वलित करने की परंपरा निभाई जाती है। सप्तमी को देवी को हल्दी का लेप लगाने और खीर का प्रसाद बांटने का विशेष महत्व है। जसगीत की स्वर लहरियों के बीच श्रद्धालु देवी की आराधना करते हैं। पर्व के अंतिम दिन जवारा और ज्योति कलश विसर्जन यात्रा निकाली जाती है, जिसमें बड़ी संख्या में महिलाएं भाग लेती हैं। पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ जवारा का विसर्जन हसदेव नदी में किया जाता है।
पाली क्षेत्र का चैतुरगढ़ पहाड़ भी धार्मिक और प्राकृतिक विरासत का प्रमुख केंद्र है। यहां ऊंचाई पर स्थित अष्टभुजी देवी का मंदिर प्राचीन नागर स्थापत्य शैली के लिए जाना जाता है। पहाड़ की हरियाली, प्राकृतिक वातावरण और ऐतिहासिक संरचना इस स्थल को श्रद्धालुओं के साथ पर्यटकों के लिए भी आकर्षण का केंद्र बनाती है।
इन मंदिरों की विशेषता केवल उनकी प्राचीनता या धार्मिक मान्यताएं नहीं हैं। आसपास के गांवों में माता चौरा स्थापित कर कोसगाई, मड़वारानी, मातिन दाई और अष्टभुजी देवी की पूजा करने की परंपरा बताती है कि यहां की आस्था ग्रामीण जीवन का अभिन्न हिस्सा है। नवरात्र के दौरान शहरों में गरबा और डांडिया की धूम रहती है, वहीं पहाड़ी मंदिरों में मादर और झांझ की थाप पर जसगीत गूंजते हैं। गांवों से आने वाली जसगीत मंडलियां सामूहिक आराधना के इस उत्सव को जीवंत बनाती हैं।
कोरबा के ये देवी स्थल धार्मिक पर्यटन की संभावनाओं के साथ जिले की लोक संस्कृति और ऐतिहासिक पहचान को भी सामने लाते हैं। इनकी परंपराओं का संरक्षण आने वाली पीढ़ियों को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।







